केवलानंद आश्रम—आजादी की विरासत को बचाने की जिम्मेदारी किसकी?
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आजादी की गाथा समेटे केवलानंद आश्रम, इतिहास के पन्नों में सिमटता जा रहा गौरव
ऋषिकेश। मायाकुंड स्थित केवलानंद आश्रम तीर्थनगरी के उन ऐतिहासिक स्थलों में शामिल है, जिसकी दीवारें देश की आजादी के संघर्ष की कई अनकही कहानियों की गवाह रही हैं। करीब 119 वर्ष पुराने इस आश्रम का इतिहास स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ा रहा है। कभी यहां स्वतंत्रता सेनानियों के ठहरने से लेकर देश को अंग्रेजी हुकूमत से आजाद कराने की रणनीति तैयार करने तक की गतिविधियां हुआ करती थीं। महात्मा गांधी, पंडित जवाहरलाल नेहरू और शहीद भगत सिंह जैसे स्वतंत्रता आंदोलन के प्रमुख नामों की स्मृतियां भी इस आश्रम से जुड़ी बताई जाती हैं।
आश्रम संचालक प्रकाश आनंद स्वामी के अनुसार वर्ष 1907 में केवलानंद महाराज ने करीब चार बीघा भूमि में इस आश्रम की स्थापना कर इसका संचालन शुरू किया था। उस दौर में यह आश्रम साधु-संतों के साथ ही स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े लोगों के लिए भी महत्वपूर्ण ठिकाना रहा। आंदोलनकारी यहां कुछ समय विश्राम करने के बाद अपनी-अपनी दिशा में निकल जाते थे। आश्रम में देश की आजादी को लेकर विचार-विमर्श और आगे की रणनीति पर चर्चा किए जाने की बातें भी सामने आती हैं।
भगत सिंह की शहादत से भी जुड़ी स्मृतियां
केवलानंद आश्रम की सबसे महत्वपूर्ण स्मृतियों में शहीद भगत सिंह से जुड़ा प्रसंग भी बताया जाता है। आश्रम संचालक के मुताबिक भगत सिंह की शहादत के बाद आश्रम में उनका पिंडदान किया गया था। यही वजह है कि आश्रम केवल धार्मिक आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि स्वतंत्रता संग्राम की स्मृतियों को संजोए एक ऐतिहासिक
धरोहर के रूप में भी अपनी अलग पहचान रखता है।
आश्रम की परंपरा आज भी पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ रही है। वर्ष 1907 से अब तक आश्रम की चौथी पीढ़ी इसकी देखरेख कर रही है। वर्तमान संचालक प्रकाश आनंद स्वामी ने बताया कि आश्रम आज भी किसी ट्रस्ट के अधीन नहीं है और स्वतंत्र रूप से संचालित होता है। आश्रम की पुरानी परंपराओं और इतिहास को जीवंत रखने का प्रयास लगातार किया जा रहा है।
तांबे के पत्र में दर्ज है सम्मान की निशानी
केवलानंद महाराज के योगदान और स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े उनके कार्यों की याद आश्रम में आज भी सुरक्षित है। आश्रम संचालक के अनुसार केवलानंद महाराज को ताम्रपत्र से सम्मानित किया गया था। यह ताम्रपत्र आज भी आश्रम में सुरक्षित है और आने वाली पीढ़ियों को उस दौर की याद दिलाता है, जब देश की आजादी के लिए अनेक लोगों ने अपना जीवन समर्पित कर दिया था।
विडंबना, इतिहास के इस स्थल की ओर नहीं है किसी का ध्यान
आजादी के 80वें वर्ष में देशभर में स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े स्थलों और सेनानियों की स्मृतियों को याद किया जा रहा है, लेकिन तीर्थनगरी का यह ऐतिहासिक आश्रम धीरे-धीरे लोगों की स्मृतियों से दूर होता जा रहा है। कभी जहां स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े लोगों की आवाजाही और देश की आजादी को लेकर चर्चाएं हुआ करती थीं, आज वहां उस गौरवशाली इतिहास को जानने और समझने वालों की संख्या बेहद कम है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि केवलानंद आश्रम को ऐतिहासिक धरोहर के रूप में संरक्षित कर यहां स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ी जानकारियों, दस्तावेजों और स्मृतियों को प्रदर्शित किया जाना चाहिए। यदि आश्रम के इतिहास को पर्यटन और विरासत संरक्षण से जोड़ा जाए तो यह स्थान नई पीढ़ी को स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास से जोड़ने के साथ ही ऋषिकेश के धार्मिक पर्यटन को ऐतिहासिक आयाम भी दे सकता है।
आज जरूरत इस बात की है कि केवलानंद आश्रम को महज एक पुराने आश्रम के तौर पर न देखा जाए, बल्कि उस धरोहर के रूप में संरक्षित किया जाए, जिसकी मिट्टी में देश की आजादी के संघर्ष की यादें दफन हैं। वरना आने वाली पीढ़ियां केवल किताबों में पढ़ेंगी कि ऋषिकेश में भी स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ा एक ऐसा आश्रम था, जहां कभी आजाद भारत का सपना बुना जाता था।



