तल्ला नागपुर का धार्मिक और आध्यात्मिक वैभव
दिवरा, महायज्ञ और श्रद्धा के सैलाब की महा त्रिवेणी: चंडिका बन्याथ
लेख: डॉ विक्रम सिंह बर्त्वाल
तल्लानागपुर की अधिष्ठात्री और पंचकोटी गांवों की आराध्या मां भगवती चंडिका, उमा फलेश्वरी की बन्याथ अंतिम चरण में पहुंच गई है। 6 महीने की दिवरा यात्रा के बाद महायज्ञ अनुष्ठान का आरंभ, भक्तों की उमड़ती भीड़ ने धर्म, अध्यात्म और आस्था की त्रिवेणी को महाबन्याथ रूपी संगम में बदल दिया है। 8 मई को श्री मां चंडिका यज्ञ की पूर्णाहुति के साथ फलासी स्थित मंदिर के गर्भ गृह में विराजमान हो जाएगी।

दिवरा क्या है ?….
दिवरा अथवा देवरा यात्रा एक धार्मिक यात्रा है जिसमें देवी देवताओं की डोली पंचकोटी गांवों की विवाहिता कन्याओं के ससुराल गांवों का भ्रमण करती है और उनकी कुशल क्षेम जानकर आशीर्वाद देती है। इस दौरान देवी डोली मार्ग केविभिन्न मठ,मंदिरों,देवस्थानों,दयूकों (देवता की जमीन) तीर्थों का भ्रमण करती है तथा पवित्र नदियों, संगमों, एवं झरनों के पवित्र जल से स्नान करती है।

यह देव यात्रा धार्मिक यात्रा के साथ हमारी सामाजिक एवं सांस्कृतिक विरासत में चेतना जागरण का कार्य करती है। इससे सामाजिक समरसता और सामाजिक संबंधों में प्रगाढ़ता के साथ संस्कृति के ऑर्गेनिक स्वरूप का संवर्धन होता है।
पंचकोटी गांव कौन हैं ?…..
उत्तराखंड के जिला-रुद्रप्रयाग की पट्टी तल्लानागपुर के ग्राम फलासी स्थित श्री मां चंडिका एवं तुंगनाथ जी के पंचकोटी गांवों में ग्राम फलासी, मलाऊ, छतोरा, कुंडा-दानकोट,जाखणी क्यूड़ी-कांडा,कोलू,भन्नू,तडाग, उर्खोली,वछनी,भटवाड़ी,गडिल, एवं खाली गांव शामिल हैं।

पंचकोटी गांव क्यों कहे जाते हैं ?…….
मेरे विचार से यह पंचकोसी का अपभ्रंश स्वरूप हो सकता है क्योंकि भारत के विभिन्न भागों में आयोजित देव यात्राओं के मार्ग को इस शब्द से संबोधित किया जाता है। इन पवित्र तीर्थ यात्रा मार्गो की दूरियां अलग-अलग हो सकती हैं लेकिन शब्दार्थ के अनुसार देव यात्रा की पांच कोसों लगभग 15-16किलोमीटर के वृताकार मार्ग को पंचकोसी यात्रा मार्ग कहते हैं। यह मानक हमारे पंचकोटी गांवों की दिवरा यात्रा (घर दिवारा) में पूरा होता है। इसलिए इन गांवों को। पंचकोटी गांव कहते हैं।

मान्यतानुसार 5 किल्लों अथवा कोठों के समूह को भी पंचकोटी कहा जाता है। हो सकता है कि प्राचीन काल में तल्लानागपुर के इन पंचकोटी गांवों की सीमा में पांच छोटे-छोटे पहाड़ी किले रहे हो इसीलिए इस क्षेत्र के गांवों को पंचकोटी ग्राम कहा जाता है।
बन्याथ क्या है ?…..
देवड़ोली के भ्रमण, यज्ञ और अन्य अनुष्ठानिक कार्यों की संयुक्त प्रक्रिया को बन्याथ कहा जाता है। औच्चारणिक एवं लोक प्रचलन में इसे बन्याथ,बन्यात,वन्यात, एवं बनियाथ नाम से जाना जाता है। सभी का मूल भाव एक है। वन्यात शब्द का संधि विच्छेद करने से जो अर्थ निकलता है वह वन +यात होता है। जिसका अर्थ वन की यात्रा से है। बन्याथ में वृहद यज्ञ परंपरा इस शब्द की उत्पत्ति में संस्कृत शब्द बन्ह्ही (वन्नी)की ओर इंगित करता है जिसका अर्थ अग्नि होता है।

अगर बन्याथ के मूलभूत तत्वों पर ध्यान दें तो हमें प्रकृति संतुलन के रूप में देव यात्रा (दिवरा) तथा आध्यात्मिक शुद्धि के रूप में यज्ञ के दर्शन होते हैं, जिसका केंद्रीय तत्व अग्नि होता है जिसे देवताओं का संदेश वाहक भी माना जाता है। इसलिए इसे (वन्नीयात ) अग्नि यात्रा भी माना जा सकता है।
क्योंकि यज्ञ में अग्नि रूपी संदेशवाहक के पास हमआहुति, विद्वान पुरोहितों के मुख से वेद-ऋचाओं की ध्वनि तरंगें, यजमानों का संकल्प, भक्तों का श्रद्धा भाव देवलोक अथवा देवताओं तक पहुंचाने की अनुष्ठानिक प्रक्रिया की जाती है। जिसमें वन्नी भू- लोक से देवलोक तक की यात्रा करती है।

मेरे विचार से इसीलिए इस अनुष्ठानिक प्रक्रिया को बन्याथ अथवा ‘बन्नीयात’ कहा गया होगा। बन्याथ शब्द की उत्पत्ति का मूल आधार जो भी हो उद्देश्य प्रकृति संतुलन एवं लोक कल्याण ही है।
प्रकृति संतुलन एवं लोक कल्याण के पावन केंद्रीय भाव पर कार्य करने के उद्देश्य से रुद्रप्रयाग जनपद स्थित तल्ला- नागपुर पट्टी के अंतर्गत ‘श्री तुंगेश्वर मंदिर समिति, फलासी’ ने शक्ति स्वरूपा श्री मां चंडिका की दिवरा यात्रा का आयोजन किया है। सात महीनों तक चली यह यात्रा 167 दिनों में पूर्णाहुति एवं महाप्रसाद के पवित्र लक्ष्य प्राप्ति के चरम पर है।
उल्लेखनीय है कि श्री मां चंडिका, फलेश्वरी की यह यात्रा 23 नवंबर 2025 से प्रारंभ हुई थी जिसमें 39 दिन का प्रथम घर दिवरा पचकोटी गांवों का भ्रमण रहा।
उत्तर दिवरा :
3 दिन विश्राम के उपरांत देवी का 24 दिवसीय उत्तर दिवरा भ्रमण कार्यक्रम 4 जनवरी 2026 से 27 जनवरी 2026 तक आयोजित किया गया। इस दौरान देवी ने उत्तर दिशा के सैकड़ो गांवों के साथ बाबा केदार के गद्दी स्थल ओंकारेश्वर मंदिर ऊखीमठ तक का भ्रमण किया। यात्रा वापसी के दौरान सौड़ी, अगस्तमुनि में संकटासुर वध उत्तर यात्रा का प्रमुख आकर्षण रहा।
पश्चिमी देवरा :
28 जनवरी से 8 फरवरी तक चंडिका का पश्चिम दिशा में 12 दिवसीय प्रवास रहा। पश्चिमी देवरा के दौरान 5 फरवरी को तिलवाड़ा के निकट मंदाकिनी नदी में समुद्र मंथन कार्यक्रम प्रमुख आकर्षण का केंद्र रहा। उल्लेखनीय है कि समुद्र मंथन की घटना देवताओं में अमृत के साथ शक्ति और श्री के जागरण के लिए की जाती है
दक्षिण दिवरा:
दक्षिण दिवरा में देवी का प्रवास कोटेश्वर और रुद्रप्रयाग तक रहा। इस दौरान शक्ति जागरण की प्रक्रिया ‘द्वारी कुंडली’13 फरवरी को कोटेश्वर में आयोजित की गई। क्षेत्र के दर्जनों गांवों का भ्रमण कर लौटी देवी का यह प्रवास 9 दिवसीय रहा।
पूरब दिवरा:
बाहरी दिवरा के रूप में श्री मां चंडिका की पूर्व दिशा की यह यात्रा मात्र 6 दिनों की रही। 19 फरवरी को ग्राम बजूण से शुरू हुई यह यात्रा दशज्यूला पट्टी के गांवों का भ्रमण कर 24 फरवरी को देवी फलासी स्थित मंदिर में वापस लौट गई।
मां चंडिका का द्वितीय घर दिवरा 25 फरवरी से 29 अप्रैल 2026 तक संपन्न हुआ। 64 दिवसीय इस प्रवास के दौरान देवी पंचकोटी गांवों में भ्रमण और प्रवास करती रही।इस प्रवास के अंतिम दिनों 28 अप्रैल को श्री मां चंडिका की यात्रा मलघाणा (निकट ग्वांस ग्राम) तक आयोजित की गई। बुरी शक्तियों के शमन और लोक कल्याण के लिए पूजा अनुष्ठान के बाद देवी का रात्रि प्रवास दानकोटऔर भन्नू गांव की सीमा पर किटड़ा नामक वन क्षेत्र में रहा। 29 अप्रैल की प्रातः देवी डोली फलासी स्थित मंदिर के लिए लौट गई।
30 अप्रैल से 8 मई तक फलासी स्थित मंदिर और वणातोली खेतों में बन्याथ के वृहद कार्यक्रम आयोजित किये जा रहे हैं। जिनमें कुंण्डगज, यज्ञारंभ,पैंय्यांपाती, शीराबटाई, पूजा अनुष्ठान, वेद पाठ पूजन, जगनपुरुष विवाह, नित्य प्रवचन, भंडारा,जल यात्रा भजन कीर्तन आदि कार्यक्रम आयोजित किया जा रहे हैं। इसके साथ ही चंडिका डोली भी कम समय के लिए बणातोली में प्रतिदिन नृत्य कर रही है। जल यात्रा और पूर्णाहुति के दिन देवी डोली नृत्य नहीं करती है। 25 वर्षों बाद आयोजित देवी चंडीका की बन्याथ में सातवें दिन द्वारिका पीठ के शंकराचार्य राजेश्वरानंद महाराज जी का यज्ञ क्षेत्र फलासी में प्रवचन यज्ञ अनुष्ठान के प्रमुख कार्यक्रमों में शामिल रहा।
महाबन्याथ के महाअनुष्ठान को संपन्न करने में देवी एरवालों, ब्रह्मा,यज्ञाचार्यों, पुजारियों, बांसियों, बाजगियों,दिवारियों, मंदिर कमेटी, पंचकोटी ग्रामों, ध्याणियों, स्वयंसेवियो, एवं भक्तों का अनन्य सहयोग मिल रहा है।
निश्चित ही 8 मई को ब्रह्मढाल एवं पूर्णाहुति कार्यक्रम श्री मां चंडिका फलेश्वरी की महाबन्याथ 2026 की अविस्मरणीय आध्यात्मिक ऊर्जा जीवन और सृष्टि के कल्याण में लंबे समय तक हमें चैतन्य बनाए रखेगी।



